रामामृतम्

॥ उग्गओ विमलो भाणु ॥

🌸

रामामृतम् साधना के दिव्य अनुभव में आपका स्वागत है।

रामामृतम्

महापुरुषों के चिंतन में जब यह आया कि आज का युग विज्ञान की चरम, सर्वश्रेष्ठ प्रगति का युग है जिसमें चारों ओर सुविधाओं की भरमार है और उन सुविधाओं के बावजूद भी प्रत्येक व्यक्ति किसी ने किसी रूप में कुछ खोज रहा है और वह है — शांति

रामामृतम् ध्यान साधना की पद्धति

अपने व्यस्ततम समय में से सिर्फ 7 मिनट ज्ञान की एकाग्रता का अनुभव, मंत्रों का उच्चारण और उच्चारण से वाइब्रेशन और वाइब्रेशन से चक्र का जागरण, मंत्र से संबंधित गीत की कड़ियों का गायन जिसे कोई भी व्यक्ति आसानी से सीख सकता है एवं व्यवहारिक जीवन के उपयोग में लाकर प्रतिदिन निरंतर अभ्यास कर अपने जीवन को श्रेष्ठतम मानव के रूप में विख्यात बन सकता है।

एकाग्रता सरलता क्षमा संतोष

मिनट

दैनिक साधना

मंत्र

पवित्र जप

चक्र

ऊर्जा जागरण

दिन

सातों दिन

रामामृतम् ध्यान साधना कार्यक्रम
रामामृतम्

🌸 रामामृतम् की दृष्टि

रामामृतम् केवल साधना नहीं, बल्कि श्रेष्ठ जीवन जीने की कला है। इसका उद्देश्य व्यक्ति के विचार, व्यवहार और संबंधों को अधिक संतुलित, सकारात्मक और संवेदनशील बनाना है।

रामामृतम् हमें सिखाता है—

  • आवेश नहीं, विवेक से कार्य करना।
  • दोष नहीं, गुणों पर ध्यान देना।
  • अपेक्षा नहीं, सहयोग की भावना रखना।
  • तुलना नहीं, आत्म-विकास करना।
  • तनाव नहीं, संतुलन बनाए रखना।
  • वाणी में मधुरता और व्यवहार में विनम्रता रखना।
  • वर्तमान क्षण को सजगता से जीना।
  • सेवा, करुणा और संवेदना को जीवन का आधार बनाना।

रामामृतम् का सूत्र

🌸 सकारात्मक सोच 🌸 मधुर वाणी 🌸 विनम्र व्यवहार 🌸 उत्कृष्ट कर्म 🌸 आत्मीय संबंध 🌸 संतुलित जीवन

संदेश

"साधना से प्राप्त शांति को व्यवहार में उतारना ही रामामृतम् है।"

ध्यैय वाक्य

"स्वयं को जानो, चेतना को जगाओ और अपने भीतर निहित दिव्यता एवं असीम संभावनाओं को प्रकट करो।"

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Ramamritam (प्रशिक्षक प्रशिक्षण शिविर)

08 Aug 2026  – 09 Aug 2026 (2 दिन)
Indore, Madhya Pradesh
रामामृतम् — लोगो एवं प्रतीक
रामामृतम् परिचय

रामामृतम् क्या है?

मनुष्य का जन्म केवल शरीर के रूप में होता है, किंतु जो स्वयं को जान लेता है, वही इस संसार में उच्च कोटि के महापुरुषों की श्रेणी में प्रतिष्ठित होता है।

आध्यात्मिक परंपरा के अनुसार, आदिनाथ भगवान ऋषभदेव से लेकर युग-युग में हुए अनेक तीर्थंकरों, ऋषियों, योगियों एवं महापुरुषों ने मंत्र, ध्यान और आत्म साधना के माध्यम से अपनी अंतः चेतना को जागृत किया।

यही जागृत चेतना उन्हें आत्मबोध, प्रज्ञा, करुणा, शांति, दिव्य व्यक्तित्व तथा मानवता के लिए श्रेष्ठतम सृजन और प्रेरणा दायी उपलब्धियों के शिखर तक ले गई।

रामामृतम् उसी आत्म जागरण की परंपरा से प्रेरित एक सरल, सहज कम समय सिर्फ 7 मिनट में सात चक्र पर मंत्र उच्चारण द्वारा जागरण एवं मंत्र से संबंधित जीत की कड़ी के द्वारा चक्र जागृत करने की अनुभव प्रधान साधना है, जो प्रतिपल वंदनीय रत्नत्रय के महान आराधक 1008 आचार्य श्री रामलाल जी म.सा. एवं बेले बेले तप के साथ 32 शास्त्रों का अध्ययन मनन उपाध्याय प्रवर श्री राजेश मुनि जी महाराज साहब विशिष्ट चिंतन से निकली अमृतधारा जो मंत्र और ध्यान के माध्यम से व्यक्ति की सुप्त चेतना को जागृत कर उसके श्रेष्ठ व्यक्तित्व, आंतरिक सामर्थ्य और जीवन की पूर्णता को विकसित करने का एक पावन प्रयास है।

"स्वयं को जानो, ऊर्जा केदो की चेतना को जगाओ, मंत्रों का उपयोग करो और अपने भीतर छिपे महापुरुष को, महान सृजनशीलता प्रकट करो।"

आत्म जागरण मंत्र साधना चक्र जागृति अंतः चेतना
ऊर्जा केंद्र

सात चक्रों का परिचय

सात चक्र एवं जीवन-विकास

रामामृतम् की साधना केवल ध्यान या मानसिक शांति का अभ्यास नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व-विकास की एक जागरूक यात्रा है। भारतीय चिंतन परंपरा में मानव को केवल शरीर नहीं, बल्कि चेतना, ऊर्जा और असीम संभावनाओं का केंद्र माना गया है।

सात चक्रों की अवधारणा इसी गहन दृष्टि का प्रतीक है। रामामृतम् में इन चक्रों को किसी रहस्यवाद, चमत्कार या अलौकिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-विकास के 7 महत्वपूर्ण आयामों के रूप में समझा जाता है। ये सात आयाम व्यक्ति के विचारों, भावनाओं, व्यवहार, निर्णयों, संबंधों और आत्मिक उन्नति को प्रभावित करते हैं।

जब इन सातों आयामों का संतुलित विकास होता है, तब व्यक्ति का जीवन अधिक स्थिर, प्रसन्न, प्रभावशाली, जागरूक और सार्थक बनता है।

मूलाधार

रीड की हड्डी से निचले भाग पर

स्वाधिष्ठान

नाभि से 3.5 से.मी. नीचे

मणिपुर

नाभि पर

अनाहत

हृदय का मध्य भाग

आज्ञा

दोनों भोहों के बीच ललाट पर

सहस्रार

सर के मध्य भाग पर पंडित की चोटी वाला स्थान

पवित्र जप

सप्त मंत्र : आत्मजागरण की सात सीढ़ियाँ

प्रत्येक दिन एक चक्र, एक मंत्र — ७ मिनट की साधना में जप, ध्यान और चक्र जागरण का संयोग।

दिन १ मूलाधार चक्र

धम्मं

स्थान — रीढ़ की हड्डी का निचला भाग

धर्म वह आधार है जो जीवन को स्थिरता, सुरक्षा और संतुलन प्रदान करता है। मूलाधार चक्र हमारे अस्तित्व की जड़ है।

Grounding • Stability • Fearlessness

दिन २ स्वाधिष्ठान चक्र

वीरं

स्थान — नाभि से लगभग 3.5 से.मी. नीचे

सच्चा वीर वह है जो अपनी इच्छाओं, विकारों और परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करे — उत्साह, साहस और आत्मसंयम का संचार।

Courage • Passion • Emotional Freedom

दिन ३ मणिपुर चक्र

सोहं

स्थान — नाभि

"वह मैं हूँ" — आत्मबोध का मंत्र जो शरीर से ऊपर उठाकर आत्मस्वरूप का अनुभव कराता है।

Self-belief • Inner Power • Identity

दिन ४ अनाहत चक्र

बुद्धं

स्थान — हृदय का मध्य

जागृत चेतना — विवेक, करुणा, प्रेम और सही निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करता है।

Compassion • Wisdom • Emotional Intelligence

दिन ५ विशुद्धि चक्र

शुद्धं

स्थान — कंठ

वाणी, विचार और व्यवहार की शुद्धि — सत्य बोलने, स्पष्ट संवाद और सकारात्मक अभिव्यक्ति की शक्ति।

Pure Expression • Authentic Communication • Truth

दिन ६ आज्ञा चक्र

शांतं

स्थान — दोनों भौंहों के बीच

मन की चंचलता को शांत कर एकाग्रता, विवेक और अंतर्दृष्टि का विकास — यहीं से ध्यान की गहराई प्रारम्भ होती है।

Focus • Clarity • Intuition

दिन ७ सहस्रार चक्र

अर्हंम्

स्थान — सिर का मध्य भाग

परम् मंगलमय मंत्र — आत्मा की परम शुद्धता, पूर्ण जागृति और दिव्यता का प्रतीक।

Divine Consciousness • Enlightenment • Infinite Potential

व्यवहारिक लाभ

नियमित ७-मिनट साधना से शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्तर पर मापने योग्य लाभ।

🧘

मानसिक शांति

तनाव में कमी, एकाग्रता में वृद्धि और भावनात्मक संतुलन।

💪

शारीरिक स्वास्थ्य

श्वास-प्रश्वास संतुलन, रक्तचाप नियंत्रण और ऊर्जा स्तर में सुधार।

❤️

पारिवारिक सद्भाव

संयुक्त साधना से परिवार में प्रेम, समझ और सहयोग बढ़ता है।

🤝

सामाजिक एकता

सामूहिक अभ्यास से समुदाय में सहयोग और सामाजिक बंधन मजबूत होते हैं।

🌟

आध्यात्मिक विकास

मंत्र जप और ध्यान से आत्म-जागरूकता और आंतरिक प्रकाश।

⚖️

चक्र संतुलन

७ चक्रों की सक्रियता से शरीर की ऊर्जा प्रणाली संतुलित रहती है।

प्रशिक्षण व्यवस्था

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